बांकीपुर उपचुनाव बना बिहार की राजनीति का बड़ा इम्तिहान, भाजपा की प्रतिष्ठा और पीके-तेजस्वी की साख दांव पर

बांकीपुर उपचुनाव बना बिहार की राजनीति का बड़ा इम्तिहान, भाजपा की प्रतिष्ठा और पीके-तेजस्वी की साख दांव पर

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Bankipur by-election emerges as a major test for Bihar politics

नई दिल्ली/पटना। Bankipur by-election emerges as a major test for Bihar politics, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद खाली हुई बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उप चुनाव साधारण नहीं रहने वाला है।

सरकार के बहुमत पर इसके नतीजों का कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

इसका प्रभाव सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष की राजनीति पर भी पड़ेगा, क्योंकि अब तक दूसरों के लिए रणनीति तैयार करने वाले जनसुराज के प्रशांत किशोर (पीके) पहली बार स्वयं मैदान में हैं। राजद ने भी अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया है और कांग्रेस को राहुल गांधी के विदेश यात्रा से लौटने का इंतजार है।

महागठबंधन से पीके ने मांगा समर्थन

सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष के भीतर दिखाई दे रही है। लोकसभा चुनाव में जनसुराज की शिकस्त के बावजूद पीके ने मैदान नहीं छोड़ा है और स्वयं को मुख्य विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।

बांकीपुर से चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही उन्होंने महागठबंधन से समर्थन भी मांगा है, लेकिन राजद ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। जाहिर है राजद अपनी शैली के अनुरूप तेजस्वी के समानांतर किसी को मजबूत होते नहीं देखना चाहता है।

राजद के एक वरिष्ठ नेता ने तेजस्वी यादव की मजबूरी बताई और कहा कि राजद यदि जनसुराज का समर्थन करता तो पीके की राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ जाती और वोट बैंक के बिखरने का भी खतरा रहता। ऐसे में राजद को क्या मिलता।

हालांकि, हालात बता रहे हैं कि प्रत्याशी उतारकर भी राजद को मुसीबत से मुक्ति नहीं मिलने जा रही है। अब विपक्षी ताकत का आकलन वोटों की संख्या से भी होगा। पीके को यदि राजद से ज्यादा वोट आ गए तो तेजस्वी का तिलस्म टूट सकता है।

कन्हैया का किया था विरोध

दोनों स्थितियों में दबाव कम नहीं होगा। तेजस्वी यादव के समानांतर किसी अन्य चेहरे को उभरने से रोकने की चाल राजद पहले भी अपनाता रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से भाकपा प्रत्याशी कन्हैया कुमार का राजद ने खुलकर विरोध किया और उनके खिलाफ अपना प्रत्याशी उतारा था।

इसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में पूर्णिया से पप्पू यादव को कांग्रेस का टिकट नहीं लेने दिया गया और बाद में उनके निर्दलीय चुनाव लड़ने पर उन्हें हराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई।

पीके के लिए बड़ी चुनौती

ऐसे में राजद पीके को विपक्ष के सशक्त चेहरे के रूप में उभरने देने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगा, क्योंकि यदि पीके जीतते हैं तो वे बिहार की विपक्षी राजनीति के प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो जाएंगे। लेकिन यदि हार जाते हैं तो उनके लिए दोबारा उसी राजनीतिक ताकत के साथ वापसी करना आसान नहीं होगा।

ऐसी स्थिति में तेजस्वी यादव की स्थिति विपक्ष के प्रमुख चेहरे के रूप में बरकरार रहेगी। यह चुनाव भाजपा और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है।

बांकीपुर तीन दशक से भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। पहले नवीन किशोर और उसके बाद उनके पुत्र नितिन नवीन लगातार यहां से जीतते रहे हैं। ऐसे में यदि भाजपा अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की परंपरागत सीट बरकरार रखने में सफल रहती है तो संगठन और नेतृत्व की मजबूती का संदेश जाएगा।